बारिश के मौसम का मजा लेने की कोशिशों के बीच अगर बीमार पड़ जाएं तो सारी खुशी गायब हो जाती है। कुछ बातों को ध्यान में रखकर आप बिना बीमार पड़े इस साल बारिश का मजा ले सकती हैं, बता रही हैं चयनिका…
बारिश के मौसम का मजा लेने की कोशिशों के बीच अगर बीमार पड़ जाएं तो सारी खुशी गायब हो जाती है। कुछ बातों को ध्यान में रखकर आप बिना बीमार पड़े इस साल बारिश का मजा ले सकती हैं, बता रही हैं चयनिका निगम
बागों में बहार छाई हुई है। पेड़-पौधे धुले-धुले से नजर आ रहे हैं। मौसम भी खिला-खिला है। मन बस मानसून के जादू में झूम रहा है। बरसात होते ही जुबान भी चाय और पकौड़ों का स्वाद लेने को आतुर है। लेकिन ये क्या, अचानक मौसम का खुमार उतर गया है, क्योंकि आपकी सेहत आपसे नाराज है। कह रही है, ध्यान नहीं रखा और सिर्फ मस्ती की। तो अब मौका है सेहत को दुरुस्त करने का। कुछ ऐसी बातें हैं, जिनको अपनाकर बारिश का मौसम आपको सिर्फ खुशी देगा, सेहत खराब नहीं करेगा। मौसम को ध्यान में रखते हुए अपने चारों ओर और अपने भीतर भी आपको बदलाव करने होंगे ताकि बीमारी धावा नहीं बोले। जानते हैं, मानसून से जुड़े वो कुछ सुधार, जो आपको मानसून की खूबसूरती से रूबरू होने का मौका देंगे:
विटामिन-सी से दोस्ती
क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि अकसर बारिश के मौसम में ही वायरल फीवर, एलर्जी और दूसरे संक्रमण शरीर को निशाना बनाते हैं? ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस मौसम में हवा में सबसे ज्यादा बैक्टीरिया सक्रिय होते हैं। इन बीमारियों से बचने के लिए जरूरी है कि शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता मजबूत कर ली जाए, तभी आप संक्रमण को खुद से दूर रख पाएंगी। इस काम में सबसे ज्यादा आपकी सहायता करेगा विटामिन-सी। इसके लिए अपनी डाइट में विटामिन-सी युक्त खाद्य पदार्थों की मात्रा बढ़ा लें। हरी सब्जियां, स्प्राउट, संतरा, नीबू व आंवला आदि को प्रचुर मात्रा में डाइट में शामिल करें। एक बात का ध्यान रखिए, विटामिन-सी ना ही शरीर में इकट्ठा हो पाता है और ना ही शरीर उसे बना पाता है। शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन-सी मिले, इसके लिए जरूरी है कि आप हर दिन विटामिन-सी युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करें। कभी-कभी विटामिन-सी युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने से कुछ खास लाभ नहीं मिल पाएगा।
जंक फूड से दूरी जरूरी
बाजार में मिलने वाले गोलगप्पे हों या चाउमिन या फिर चाट, खासतौर पर मानसून के मौसम में इनको खाना ज्यादा खतरनाक हो जाता है। दरअसल इस वक्त सड़क किनारे बहती नालियों या मेनहोल में पानी भरा रहता है, जिन पर कीड़े और बैक्टीरिया जमा होते हैं। यही बैक्टीरिया फिर ठीक से ढक कर न रखे गए स्ट्रीट फूड पर गंदगी छोड़ते हैं, जिन्हें खाते ही बीमार पड़ने की आशंका भी बढ़ जाती है। सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है कि खासतौर पर मानसून में खुले में बिकने वाली डिशेज या पहले से कटे फलों से नाता तोड़ लिया जाए। भले ही ये आपकी जुबान का स्वाद बढ़ाएंगे, लेकिन आपकी सेहत बिगाड़ेंगे, ये पक्की बात है।
छत की जांच कर ली?
मानसून शुरू होते ही एक काम जरूर कीजिए, जहां भी खुले में पानी इकट्ठा हो रहा हो, उसे जरूर साफ कर लीजिए। जगह-जगह जमा पानी सबसे ज्यादा बैक्टीरिया और मच्छरों को पनाह देता है। ये मच्छर इस वक्त सबसे ज्यादा बीमारी का कारण बनते हैं। घरों में ज्यादातर ऐसा छत के साथ होता है, जहां पड़े बेकार के सामानों में पानी इकट्ठा होता जाता है। इस पानी में मच्छर पनपने लगते हैं और कई बीमारियों का कारण बनते हैं। ध्यान दीजिए, कहीं भी खुले में पानी इकट्ठा हो ही ना पाए। नालियां भी साफ हों ताकि मच्छरों को पनपने का मौका ही न मिले और आप बीमार न पड़ें।
बच कर रहें एसिडिटी से
मानसून के मौसम में सबसे ज्यादा एसिडिटी होती है। इससे बचने के प्रयास जरूर करने चाहिए। आयुर्वेद की मानें तो इस मौसम में पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है। एसिडिटी से बचने के लिए ठंडी चीजें जैसे ठंडे दूध का सेवन करना चाहिए। इसके अलावा दिन में दो बार पित्त का खात्मा करने वाले चूर्ण का सेवन भी किया जा सकता है। परवल भी एसिडिटी से बचाव करता है।
इन सबके साथ इस मौसम में संक्रमण का खतरा भी रहता है। संक्रमण से बचने के लिए पानी को उबालकर ही पिएं। इस बात को ध्यान में रखें कि अधिकांश संक्रमण गंदे पानी के कारण ही होता है। संक्रमण से बचाने में विटामिन-सी मददगार होता है, इसलिए आंवला को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं। याद रखिए, नीबू खट्टा होने के कारण एसिडिटी बढ़ाता है।
नंगे पैर बारिश के पानी में छपा-छई करने का मजा ही अनोखा होता है। खासतौर पर बच्चे अकसर नंगे पैर ही बारिश के पानी में उछलकूद करने लगते हैं। लेकिन इस दौरान एक बीमारी के संपर्क में आने का खतरा बढ़ जाता है। ये बीमारी होती है, लेप्टोस्पाइरोसिस। यह एक बैक्टीरियल बीमारी है, जो गंदे पानी के कारण फैलती है। सड़क का पानी है तो तय मानिए कि उस पानी में जानवरों के पेशाब और दूसरे संक्रमित तत्व भी होते हैं। ये सब पैरों के
माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और लेप्टोस्पाइरोसिस का कारण बनते हैं।
(सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेद साइंसेज में वरिष्ठ शोध अधिकारी डॉ. अनिल मंगल से बातचीत पर आधारित)


